खेजड़ी राजस्थान का राजकीय वृक्ष है।

खेजड़ी को रेगिस्तान का गौरव व राजस्थान का कल्पवृक्ष भी कहा जाता है. खेजड़ी को सन 1983 में राजस्थान का राजकीय वृक्ष भी घोषित किया गया था. खेजड़ी का वृक्ष राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में सर्वाधिक मात्रा में पाया जाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार इस वृक्ष की आयु 5000 वर्ष मानी जाती है.

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खेजड़ी राजस्थान का राजकीय वृक्ष है। 2

भारतवर्ष के विभिन्न भागों में विभिन्न नामों से जानी जाती है, जैसे- दिल्ली क्षेत्र में इसे जाटी के नाम से जाना जाता है, पंजाब व हरियाणा में जॉड़, गुजरात में सुमरी, कर्नाटक में बनी, तमिलनाडू में बन्नी, सिन्ध में कजड़ी एवं राजस्थान में इसे खेजड़ी के नाम से पुकारा जाता है।

खेजड़ी या खेजड़ी (प्रोसोपिस सिनेरिया), जिसे राजस्थान में शमी के नाम से भी जाना जाता है, एक कठोर, सूखा प्रतिरोधी पेड़ है जो कठोर रेगिस्तान में अस्तित्व का प्रतीक रहा है। खेजड़ी वृक्ष की थार सोभा किस्म जून-जुलाई में लगाई जाती है।

खेजड़ी के पेड़ आमतौर पर रेगिस्तानी इलाकों में पाए जाते हैं। दिए गए भारतीय राज्यों में से केवल भारतीय राज्य राजस्थान में ही रेगिस्तान मिलने की उम्मीद की जा सकती है। Q. अमृता देवी बिश्नोई ने खेजड़ी वृक्षों को वनों की कटाई से बचाने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया।

लोक देवता की तुलना में, गोगाजी आमतौर पर खेजड़ी के पेड़ के नीचे पाए जाते है.

खेजड़ी (प्रोसोपिस साइनेरेरिया) शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में पाया जाने वाला बहुउपयोगी एवं बहुवर्षीय वृक्ष है। यह लेग्यूमिनेसी कुल से संबंधित फलीदार पेड़ है जिसकी पत्तियां उच्च कोटि के पोषक चारे के लिए प्रख्यात हैं । खेजड़ी के पत्तियों का चारा (लूंग) बकरियाँ, ऊँट तथा अन्य पशु बड़े चाव से खाते हैं ।

खेजड़ी का पेड़ मुख्यतः रेगिस्तानी इलाकों में पाया जाता है। यह बिना अधिक पानी के भी बढ़ सकता है । इसकी छाल का उपयोग औषधियां बनाने में किया जाता है। लोग इसके फलों को पकाकर खाते हैं.

सरकार की अनुमति के बिना पेड़ को कटाना अपराध है। भारतीय वन कानून 1927 के अनुसार सेक्शन 68 के अंतर्गत पर्यावरण कोर्ट में मामला दर्ज हो सकता है।

जाटी राजस्थान में खेजड़ी नाम से जाना जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि वर्षों से जन्माष्टमी के दिन सुख दुख का साथी जाटी अर्थात खेजड़ी की पूजा की जाती है। माना जाता है कि उस वक्त गैस सिलेंडर नहीं होते थे उस वक्त किसान जाटी को जलाकर खाना पकाते थे। वहीं हवन में वृक्ष की लकड़ी का प्रयोग आज भी हो रहा है।

निष्कर्ष

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